नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लिए चमार रेजीमेंट ने की थी अंग्रेजों से बगावत!

नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लिए चमार रेजीमेंट ने की थी अंग्रेजों से बगावत!

अंग्रेजों से विद्रोह कर नेताजी सुभाषचंद्र की आजाद हिंद फौज के साथ लड़ने वाली चमार रेजीमेंट को फिर बहाल करने की मांग हो रही है नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज का गठन किया था. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े क्रांतिकारियों में शुमार बोस ने "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा" का नारा दिया, जो लोगों में देशभक्ति की लौ जलाता रहा. नेताजी के समय ब्रिटिश आर्मी में दलित लड़ाकों की एक रेजीमेंट थी, जिसका नाम था चमार रेजीमेंट . इस रेजीमेंट ने जापान के खिलाफ लड़ाई लड़ी लेकिन जब उसे अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज से लड़ने को कहा तो उन्होंने विद्रोह का विगुल बजा दिया. दलित लड़ाकों (महार) ने अंग्रेजी सेना में रहते हुए एक लड़ाई भीमा-कोरेगांव (महाराष्ट्र) में लड़ी थी. लेकिन चमार रेजीमेंट और महारों की लड़ाई के बीच एक बड़ा फर्क यह है कि जहां महार अंग्रेजों की ओर से लड़ रहे थे, वहीं चमार रेजीमेंट ने आजाद हिंद फौज के लिए अंग्रेजों से विद्रोह कर दिया था. अंग्रेजों ने चमार रेजीमेंट के लड़ाकों का इस्तेमाल सबसे शक्तिशाली मानी जाने वाली जापानी सेना से लड़ने के लिए किया था. लेकिन जब उन्होंने इन सैनिकों को आईएनए से लड़ने का आदेश दिया तो उन्होंने बगावत का रास्ता अपनाना बेहतर समझा. दलित समाज के लोग इस रेजीमेंट की लंबे वक्त से बहाली की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज कहीं दबकर रह जाती है. चमार रेजीमेंट पर जेएनयू में रिसर्च कर रहे सतनाम सिंह के मुताबिक दूसरे विश्वयुद्ध के समय अंग्रेज सरकार ने यह रेजीमेंट बनाई थी, जो 1943 से 1946 यानी सिर्फ तीन साल ही अस्‍तित्‍व में रही. ‘चमार रेजीमेंट और उसके बहादुर सैनिकों के विद्रोह की कहानी उन्‍हीं की जुबानी’ नामक किताब के लेखक सतनाम सिंह बताते हैं कि "कोहिमा में चमार रेजीमेंट ने अंग्रेजों की ओर से 1944 में जापानियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. यह इतिहास की सबसे खूंखार लड़ाईयों में से एक थी. इसके बाद वे रंगून में लड़े." "उस वक्त दुनिया की सबसे ताकतवर सेना जापान की मानी गई थी. जापान को हराने के लिए अंग्रेजों ने इसका इस्तेमाल किया. कोहिमा के मोर्चे पर इस रेजीमेंट ने सबसे बहादुरी से लड़ाई लड़ी. इसलिए इसे बैटल ऑफ कोहिमा अवार्ड से नवाजा गया था." चमार रेजीमेंट थी तो उसे क्‍यों खत्‍म किया गया चमार रेजीमेंट को बहाल करने की मांग करने वाले दलित नेता आरएस पूनिया बताते हैं कि "एक वक्त ऐसा आया जब अंग्रेजों ने चमार रेजीमेंट को प्रतिबंधित कर दिया था." अंग्रेजों ने इसे आजाद हिंद फौज से मुकाबला करने के लिए सिंगापुर भेजा. रेजीमेंट का नेतृत्व कैप्टन मोहनलाल कुरील कर रहे थे. कैप्टन कुरील ने देखा कि अंग्रेज चमार रेजीमेंट के सैनिकों के हाथों अपने ही देशवासियों को मरवा रहे हैं. इसके बाद उन्‍होंने इसको आईएनए में शामिल कर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने का निर्णय लिया. तब अंग्रेजों ने 1946 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया. अंग्रेजों से युद्ध के दौरान चमार रेजीमेंट के सैकड़ों सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी. कुछ म्यांमार व थाईलैंड के जंगलों में भटक गए. जो पकड़े गए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया. कैप्टन मोहनलाल कुरील को भी युद्धबंदी बना लिया गया. जिन्हें आजादी के बाद रिहा किया गया. वह 1952 में उन्नाव की सफीपुर विधान सभा से विधायक भी रहे. इस रेजीमेंट को बहाल करने की लड़ाई लड़ने वाले दलित नेता शांत प्रकाश जाटव के मुताबिक अब इसके मात्र एक सैनिक जिंदा हैं. ये हैं हरियाणा के महेंद्रगढ़ निवासी चुन्‍नीलाल. क्या बहाल हो पाएगी यह रेजीमेंट दलित नेता शांत प्रकाश जाटव के मुताबिक, आजादी के बाद से ही चमार रेजीमेंट बहाल किए जाने की आवाज कई बार उठाई गई, लेकिन आवाज दबकर रह गई. दलित इस रेजीमेंट को बहाल करने के लिए कई राज्‍यों में प्रदर्शन कर चुके हैं. अब इसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है. इसे लेकर पिछले दिनों राष्‍ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने संज्ञान लिया था. आयोग के तत्कालीन सदस्य ईश्वर सिंह ने रक्षा सचिव को नोटिस जारी किया था. जिसमें पूछा गया था कि आखिर इस रेजीमेंट को किन कारणों से बंद किया गया. ईश्‍वर सिंह के मुताबिक "दलित किसी भी विषम परिस्‍थिति में रह लेता है. उतनी कठिनाई में शायद ही कोई और जीवन व्‍यतीत करता हो, फिर भी इनकी रेजीमेंट सेना में बहाल क्‍यों नहीं की जा रही है." उधर, जाटव ने अक्‍टूबर 2015 में केंद्र सरकार से इस रेजीमेंट की बहाली की मांग की थी. उनका दावा है कि इसी मांग पर नवंबर 2015 में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने लिखा था कि ‘मामले की जांच करवा रहा हूं’. उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि पाठ्य पुस्तकों में चमारों की गौरवगाथा को शामिल किया जाए. उन्होंने बताया कि चमार रेजीमेंट फोरम बनाकर हम दलितों को बता रहे हैं कि उनका इतिहास कितना गौरवशाली रहा है. वे लड़ाके थे. जाटव के मुताबिक, जाटव के मुताबिक 30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान निकोबार को अंग्रेजों से आजाद कराया था, इसमें चमार रेजीमेंट का भी सहयोग था. उनका कहना है कि इसके जिन सैनिकों को बागी घोषित कर अंग्रेजों ने 1943 में जेलों में बंद कर यातनाएं दीं उन सभी को सैनिक बोर्डों द्ववारा सूचीबद्ध करके स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया जाए. रेजीमेंट पर लिखी गई है किताब हवलदार सुलतान सिंह ने ‘चमार रेजीमेंट और अनुसूचित जातियों की सेना में भागीदारी’ शीर्षक से किताब लिखी. दूसरी किताब सतनाम सिंह ने ‘चमार रेजीमेंट और उसके बहादुर सैनिकों के विद्रोह की कहानी उन्‍हीं की जुबानी’ नाम से लिखी. इस समय सेना में मराठा लाइट इन्फेंट्री, राजपूताना राइफल्स, राजपूत रेजिमेंट, जाट रेजिमेंट, सिख रेजिमेंट, डोगरा रेजिमेंट, नागा रेजिमेंट, गोरखा रेजीमेंट हैं.