बस्तर सांसद दीपक बैज ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दिया लोगों को संदेश

जगदलपुर बस्तर सांसद दीपक बैज आज प्रेस को जारी एक विस्तृत बयान में कहा जिस तरह से मंदी के दौर में भी छत्तीसगढ़ पर प्रभाव नही पड़ा था ठीक उसी तरह मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दुरदृष्टिता का ही परिणाम है कि कोरोना संक्रमण व लॉकडाउन के दौर में भी प्रदेश में भुखमरी की नौबत नही आई है इसके दो महत्वपूर्ण कारण है रिकार्ड तोड़ किसानों की धान खरीदी और दूसरा सभी जरूरतमंद लोगों का राशन कार्ड बनाया जाना। दीपक बैज ने कहा कोरोना संक्रमण से बचाव सोशल डिस्टेंसिंग ही पर्याप्त नही है, बल्कि ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग जरूरी है और इसमें भी भूपेश सरकार WHO के इस गाईड लाइन से भी बेहतर काम कर रही है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ आज भी कोरबा के नये मामले आने के बाद भी पहले स्टेज में ही है।

युवा सांसद दीपक बैज ने कहा संवेदनशीलता को सही मायने में परिभाषित करने वाले छत्तीसगढ़ शासन के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ही हैं जो कोरोना वायरस से उत्पन्न हुई स्थिति को लेकर कई अहम निर्णय इसके पूर्व ही ले चुके थे।अपने ही राज्य में लॉकडाउन की स्थिति से गुजर रहे दीपक बैज का पहला सवाल तो ये है कि क्या लॉकडाउन के अलावा भी कोई विकल्प था? और नहीं था तो भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह कहाँ तक सही है। क्या भारत में संक्रमण के जो आँकड़े आ रहे हैं वो वाकई वास्तविक है या इससे कहीं परे भी है। इन तमाम सवालों के साथ-साथ सांसद ने चिंता व्यक्त की है कि कोरोना वायरस के भारत में पहुंचने से पहले ही देश की अर्थव्यवस्था की हालत चिंताजनक थी, ऐसे में जब लोगों के स्वास्थ्य पर संकट छाया है तो दूसरी ओर पहले से कमज़ोर अर्थव्यवस्था को और बड़ा झटका मिल सकता है।

उन्होंने कहा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ प्रदेश में लम्बे समय से काबिज भाजपा की सरकार को कांग्रेस का मुखिया रहते अपने कुशल नेतृत्व के बलबूते उखाड़ फेकने सफल हुए थे और आज वही कुशलता मुख्यमंत्री के रूप में छत्तीसगढ़ की 2 करोड़ 30 लाख जनता देख रही है। उन्होंने अपनी लेख की शुरुआत 24 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कहे गए देश के नाम संदेश से शुरू करते हैं । जब उन्होंने कहा था कि सरकार यह देख रही है कि किस तरह से इस महामारी ने दुनिया के विकसित देशों को भी घुटनों पर ला खड़ा किया है। मोदी ने कहा था कि ऐसा नहीं है कि इन देशों ने इससे निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए या इनके पास संसाधनों का अभाव था। हकीकत यह है कि कोरोना वायरस का फैलाव इतनी तेजी से हुआ है कि सारी तैयारियों और कोशिशों के बावजूद दुनिया के देश इससे निपटने में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।प्रधानमंत्री ने सोशल डिस्टेंसिंग को ही फिलहाल इससे प्रभावी तौर पर जीतने का एकमात्र जरिया बताया। साथ ही अलग-अलग देशों के इससे निपटने के तरीकों के विश्लेषण से इस नतीजे पर पहुँचने की बात कही। दीपक बैज कहते हैं क्या हिंदुस्तान आज उस स्थिति में है कि अन्य देशों के अनुरूप यहाँ एकमात्र तरीका सोशल डिस्टेंसिंग के बदौलत इस जंग को जीती जा सकती है? एक मात्र दक्षिण कोरिया ही है जो अपने यहां इस बीमारी की चपेट में आने वालों की संख्या को कम करने में सफल रहा है और उसकी वजह ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग करना रही है।इसका सीधा सा अर्थ है इस महामारी को रोकने में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ ही सबसे अहम बात अधिक से अधिक टेस्टिंग का होना भी जरूरी है। सामाजिक दूरी और लॉकडाउन के जरिए ही वायरस की चेन को तोड़ा जा सकता है, जरूरी नही है। मार्च 2020 की शुरुआत में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) ने जब ऐलान किया कि कोरोना वायरस एक वैश्विक महामारी है। उसी समय हमें संभल जाना था और मेडिकल संसाधन को बढ़ाने जुट जाना था। भारत में केवल उन लोगों की टेस्टिंग की जा रही है जो कि या तो इस महामारी से प्रभावित देशों की यात्रा करके लौटे हैं या कोविड-19 के मरीजों के संपर्क में आए हैं। दीपक बैज बताते हैं एक रिपोर्ट्स के मुताबिक, डब्ल्यूएचओ की हर 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर की सिफारिश के उलट भारत में हर 10,000 लोगों पर एक डॉक्टर है,ऐसा नहीं कि ये कमी छत्तीसगढ़ में नही है पर अब छत्तीसगढ़ भी WHO के मापदंडों के अनुरूप इसे करने जा रही है।
इस तरह से देखा जाए तो आज हम बड़े ही कठिन से कठिन की स्थिति में हैं जबकि भारत तीसरे स्टेज को पर कर चुका है उस परिस्थिति में जब हमारे आँकड़े वास्तविक नही है।
वे आगे बताते हैं 24 मार्च को जब पूरे देश में 21 दिन के लिए लॉकडाउन की घोषणा हुई तो कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं था कि कंस्ट्रक्शन और असंगठित क्षेत्र के मजदूर इससे कैसे निपटेंगे। दूसरे देशों से तुलना करें तो भले ही वहाँ मेडिकल सुविधाओं, टेस्टिंग किट्स की कमी या दूसरी दिक्कतें होंगी लेकिन उनके यहाँ भारत जैसी प्रवासी मजदूरों की बड़ी तादाद नहीं है। हमारे शहरों में ऐसा एक बड़ा तबका है जो रोजाना की मजदूरी पर जीवनयापन करता है। 2017 के इकॉनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि 2011 से 2016 के बीच करीब 90 लाख लोग एक राज्य से दूसरे राज्य पैसे कमाने के लिए गए। 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश के अंदर एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या करीब 1.39 करोड़ है।इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन, खनन और खेतीबाड़ी में भी बड़ी तादाद में प्रवासी मजदूर लगे हुए हैं। भारत में असंगठित क्षेत्र देश की करीब 94 फीसदी आबादी को रोजगार देता है और अर्थव्यवस्था में इसका योगदान 45 फीसदी है। लॉकडाउन की वजह से असंगठित क्षेत्र पर बुरी मार पड़ी है क्योंकि रातोंरात हजारों लोगों का रोजगार छिन गया। आज इन्हीं पर संकट की घड़ी आ गई है। प्रधानमंत्री ने 24 मार्च को जब 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की तो उन्होंने ये सारी बातें नहीं कही थीं। उन्हें लोगों को आश्वस्त करना चाहिए था कि सरकार रहने और खाने-पीने की समस्या नहीं होने देगी। जब हालात बिगड़े तब सरकार को इसकी याद आई। पीएम मोदी की इस घोषणा की तुलना 2016 की नोटबंदी से की जा रही है। सांसद ने कहा कभी दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की विकास दर बीते साल 4.7 फीसदी रही। यह छह सालों में विकास दर का सबसे निचला स्तर था। साल 2019 में भारत में बेरोजगारी 45 सालों के सबसे अधिकतम स्तर पर थी और पिछले साल के अंत में देश के आठ प्रमुख क्षेत्रों से औद्योगिक उत्पादन 5.2 फीसदी तक गिर गया। यह बीते 14 वर्षों में सबसे खराब स्थिति थी। कम शब्दों में कहें तो भारत की आर्थिक स्थिति पहले से ही ख़राब हालत में थी। ऐसे में कोरोना संकट ने देश को और भी मुश्किल की घड़ी में डाल दिया है। लाखों की संख्या में कई प्रदेशों के मजदूर पलायन कर शहर से गाँव की ओर कूच कर रहे हैं तो सभी राज्य में समान रूप से ऐसे जरूरत मंद लोगों की तत्कालीक व्यवस्था में भी देरी हो रही है। उन्होंने कहा छत्तीसगढ़ राज्य के परिपेक्ष्य में यह बात और है कि यहाँ बिल्कुल भी उलट है। दीपक बैज ने मोदी सरकार से सवाल किया है कि जो गरीब लोग पीडीएस या पीएमजीकेवाई में कवर नहीं हो पा रहे हैं उनके लिए क्या प्रावधान हैं। इन खामियों को दूर क्यों नहीं किया गया? इसी बात को लेकर हमारे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री को पत्र भेज कर मनरेगा के तहत आने वाले भूमिहीन मजदूर व असंगठित क्षेत्र के कामगारों जिन्हें 15000 प्रतिमाह से कम राशि प्राप्त होती हो, उनकी भविष्य निधि की सम्पूर्ण राशि आगामी 3 माह तक केन्द्र सरकार द्वारा वहन करने और उसमें किसी भी तरह की पूर्व शर्त नहीं रखने का अनुरोध किया है। सांसद ने आगे कहा प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाते इस संकट की घड़ी में उन्होंने कोरोना का संक्रमण बढ़ता उसके पहले ही उन बातों को केंद्रित कर ठोस योजना बनाना शुरू कर दिया था कि इसके चपेट में सबसे ज्यादा मुश्किल किस वर्ग को आने वाला है।''कोई भी भूखा न रहे सरकार इसका प्रयास कर रही है।" बैज ने कहा यह विकट संकट की घड़ी है। 130 करोड़ आबादी वाले देश में तीन हफ़्तों के लिए लॉकडाउन घोषित किया गया है। लोगों को घरों में रहने के लिए कहा गया है और कारोबार पूरी तरह ठप हैं। बड़ी संख्या में लोग घरों से काम कर रहे हैं और प्रोडक्टिविटी में भारी गिरावट देखने को मिल रही है।इसी को दृष्टिगत रखते हुए भूपेश सरकार ने प्रदेश में 1.45 लाख जरूरतमंद को निःशुल्क भोजन व मास्क की व्यवस्था की है जिसे जरूरत के हिसाब से आगे चल कर और बढ़ाया जाएगा।अन्य प्रांतों में जिस तरह की पलायन को लेकर कोहराम मचा हुआ है छत्तीसगढ़ में कहीं नही है। इसका एक मात्र कारण है सभी को खाना मिल रहा है। ऐसी व्यवस्था है कि कोई भूखा न रह पाए। प्रदेश में कहीं भी अफरा तफरी की स्थिति नही है।प्रदेश की कुल जनसंख्या की स्थिति के हिसाब से लोगों की टेस्टिंग भी बनिस्बत अन्य राज्यों से ठीक है। शासन द्वारा विदेश से लौटे उन लोगों को सामने लाने कठोर नियम बना कर उनका टेस्टिंग करने व आइसोलेशन में रहने गंभीर हैं। शासन और प्रशासन की सही रणनीति के कारण ही देखा जाए तो छत्तीसगढ़ संक्रमण के मामले में आज भी पहले स्टेज में ही है और हमारा यही प्रयास है कि इस संक्रमण को किसी भी सूरत में आगे बढ़ने नही देंगे।इसलिए भी की हमारी तैयारी पूरे प्रदेश में अभी से चौथे स्टेज की है।

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