हैदराबाद के भारत में विलय होने की पूरी कहानी...

हैदराबाद के भारत में विलय होने की पूरी कहानी...

हैदराबाद के भारत में विलय होने की पूरी कहानी....
  15 अगस्त 1947 दुनिया के मानचित्र पर दो देशों के अस्तित्व में आने की तारीख है । धर्म के आधार पर हुए विभाजन से दो देश अस्तित्व में तो आ गए लेकिन इसके बावजूद कश्मीर , जूनागढ़ और हैदराबाद तीन ऐसी रियासतें थी , जो नए बने दोनों देशों में शामिल नहीं होना चाहती थी । हैदराबाद को भारत में मिलाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लॉर्ड माउंटबेटन के साथ मिलकर शांति का रास्ता अपनाना चाहते थे , तो तत्कालीन गृहमंत्री बल्लभ भाई पटेल सैनिक कार्यवाही के दम पर हैदराबाद के निजाम को विवश करके विलय कराने में विश्वास रखते थे । आखिरकार पटेल की रणनीति से ही हैदराबाद को भारत में मिलाया गया जिसके लिए 13 दिसंबर 1948 को शुरू हुआ 'ऑपरेशन पोलो'
      हैदराबाद को भारत में विलय कराने के लिए भारत की सेना ने जिस अभियान के तहत कार्यवाही की उसे 'ऑपरेशन पोलो' नाम दिया गया था । यह अलग बात है कि इस अभियान का संबंध किसी खेल से नहीं है । 'ऑपरेशन पोलो' नाम इसलिए दिया गया था क्योंकि हैदराबाद में तब 12 पोलो खेल मैदान हुआ करते थे । पोलो को भारत में राजा - महाराजाओं का खेल कहा जाता था । ज्यादातर राजा इसे खेलना पसंद करते थे । वैसे भी हैदराबाद के निजाम उस समय के सबसे अमीर शासक हुआ करते थे । इस लिहाज से वहां पर सर्वाधिक 12 पोलो खेल मैदान थे । यह वही खेल है जिसमें गुलाम वंश के प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक की पोलो खेलते हुए सन-1210 में मृत्यु हो गई थी ।


       बंटवारे के बाद दो देश अस्तित्व में तो आ गए लेकिन हैदराबाद दोनों देशों में से किसी में विलय होने के लिए राजी नहीं हुआ । क्षेत्रफल के लिहाज से हैदराबाद इंग्लैंड और स्कॉटलैंड से बड़ा था । हैदराबाद का क्षेत्रफल 82697 वर्ग मील था । अंग्रेजों के शासन काल में भी हैदराबाद के पास अपनी सेना , रेल सेवा और डाकघर की सुविधा हुआ करती थी । हैदराबाद सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से सबसे उन्नत राज्य हुआ करता था । निजाम ने भरपूर कोशिश की कि हैदराबाद भारत में न विलय हो । उन्होंने इसके लिए पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को काफी मोटी रकम भी दी थी कि वह हैदराबाद के भारत में विलय न होने के लिए मदद करेंगे , ऐसा कहा जाता है । जिसके सबूत समय-समय पर आजादी के बाद हैदराबाद के विषय में मोहम्मद अली जिन्ना और पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व ने दिये है ।

 

हैदराबाद के निजाम के संबंध पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के अलावा अन्य देशों से भी मैत्रीपूर्ण थे , जो भारत की परेशानियां बढ़ाने के लिए काफी थे । भारत देश के बीचोबीच बसे हैदराबाद को बल्लभ भाई पटेल कैंसर की तरह देखते थे । वह मानते थे कि यदि हैदराबाद भारत में विलय के अलावा कोई भी निर्णय पर पहुंचता है , तो उसमें भारत का ही नुकसान होगा । चाहे वह स्वतंत्र रहे या फिर पाकिस्तान में ही क्यों न चला जाए इसलिए वह इस समस्या का इलाज हर कीमत पर करना चाहते थे , तो हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली ख़ान हैदराबाद को भारत - पाकिस्तान से एक अलग देश बनाना चाहते थे । हैदराबाद में 80 प्रतिशत के लगभग हिंदू रहते थे । मुस्लिम वहां पर अल्पसंख्यक होने के बावजूद तमाम बड़े पदों पर आसीन थे ।

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इतिहासकार के.एम. मुंशी की किताब 'द एंड ऑफ ऐरा' में लिखा है कि हैदराबाद के निजाम ने जिन्ना को एक पत्र में लिखकर पूछा था कि अगर हैदराबाद और भारत के बीच सैन्य कार्यवाही हुई , तो क्या पाकिस्तान हैदराबाद का साथ देगा ? जिसका उत्तर भारत के मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर की किताब 'बियोंड द लाइंस' में लिखा है कि जिन्ना ने निजाम के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह मुट्ठी भर एडिट लोगों के लिए पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे । पाकिस्तान के जवाब के बाद निजाम ने भारत के सामने एक प्रस्ताव रखा कि हैदराबाद को एक स्वायत्त राज्य रखते हुए विदेश , रक्षा और संचार मामलो की जिम्मेदारी भारत को सौंप दी जाए लेकिन पटेल तो कुछ और ही चाहते थे । उन्होंने जनरल के. एम. करिअप्पा के साथ बैठक की और पूछा अगर हैदराबाद पर सैनिक कार्यवाही के दौरान पाकिस्तानी सेना ने हैदराबाद की मदद की , तो क्या हमें इसके लिए अतिरिक्त व्यवस्था की आवश्यकता है ? जिसके जवाब में के. एम. करियप्पा ने कहा नहीं । इसके बाद पटेल ने गुप्त तरीके से सेना को हैदराबाद मे भेजना शुरू कर दिया । जब यह बात जवाहरलाल नेहरू और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को मिली , तो वह चिंतित हो गए क्योंकि उनका मानना था कि ऐसी परिस्थिति में पाकिस्तान हैदराबाद का साथ देगा । तमाम बातचीत के बाद कोई हल न निकलने पर 13 दिसंबर की रात को ऑपरेशन पोलो की शुरुआत की गई जिसका नेतृत्व मेजर जे.एन. चौधरी ने किया । पहले दो दिन भले ही भारतीय सेना को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा हो लेकिन अंत में हैदराबाद की सेना ने 17 दिसंबर की शाम को हथियार डाल दिए और इस प्रकार से हैदराबाद रियासत का भारत में विलय हो गया । पांच दिन की इस सैन्य कार्यवाही में 1373 के लगभग रजाकार मारे गए थे । हैदराबाद के आठ सौ और भारत के 65 जवान भी शहीद हुए थे